Tuesday, May 17, 2011

चाहत

 

 




चाह भी क्या चीज है,
चाहत के आसमान मे, 
स्वछंद उड़ने की चाह
बाँहों मे बाहें डाल
घूमने की चाह 
मिलने पर ठुकराने की चाह 
न मिलने पर ढूंढने की चाह,
ढूंढते हुए किसी और को 
ढूंढने की चाह,
इसलिए 
चाहते अनेक पर, 
उन्हें काबू करने की चाह,
अनियंत्रित होने की चाह,
अपने मे डूब जाने की चाह,
ये चाहते भी क्या खूब है,
किसी को जीने की चाह,
तो कोई मरने की चाहत,
या मरते हुए भी जीने की चाह,
चाहते 
हाँ यही है चाह,
सब कुछ बस चाह---
और चाहते----
बनती है फिर से 
नई चाह ----------मुसाफिर क्या बेईमान    
   
 

2 comments:

रश्मि प्रभा... said...

अनियंत्रित होने की चाह,
अपने मे डूब जाने की चाह,
ये चाहते भी क्या खूब है,
किसी को जीने की चाह,
तो कोई मरने की चाहत,
या मरते हुए भी जीने की चाह,... waah , bahut hi saralta se chah ko nikhara hai

संजय भास्कर said...

मनोहारी अद्भुत चित्रण चाहत का...