Wednesday, May 11, 2011

ग़मों की तरलता

वो पीते, गम भुलाने को, 
आती यादें, पीने के बाद
और पीते, शायद भूल जाएँ, 
पी--पी कर लेते, अपने से ही,
प्यार मे इंतकाम
अश्रु लाता, मिठास, इंतकाम मे,
और पीते, यही कहते,
अपनी मौत का किया इंतजाम, 
यही है मेरा इंतकाम, 
लेकिन, 
यादें बढती जाती,
पीना बढता जाता
दो लम्हे का आराम भी, 
करता बैचन 
और, चलता जाता
पीना लगातार, बारबार, लगातार.
                                                    मुसाफिर क्या बेईमान 

3 comments:

संजय भास्कर said...

thik hai misafir bhai par jyada mat peena

संजय भास्कर said...

सार्थक रचना।

मुसाफिर क्या बेईमान said...

बहुत खूब कहा. शुक्रिया. संजय जी