Tuesday, May 10, 2011

इक शाम-दोस्ती के नाम


वो बैठे शांत चित्त, अख़बार बिछाये दीवार पर,
करती अठखेलियां उगलियाँ, सताने को, एक-दूसरे पर,
बाटें अपने- अपने जीवन की घटनाएँ
जैसे सुना रहें युद्घ के वृत्तांत, मिलकर दो फौजी सिपाही 
मंद- मंद गुणगुना रहे गीतश्रवणों में, एक-दूजे के,
जैसे विविध भारती प्रायोजित करता, सैनिक भाइयों का कार्यक्रम
नवम्बर की भीनी- भीनी ठंडी हवा के झोकों का,
लेते आनंद
बेखबर दुनिया सेकर रहें दिलों-मन को हल्का,
करते वार्तालापअपनी-अपनी दुनिया की,
करे समाज, देशशोध-प्रक्रिया, जाती प्रथा की चर्चा
पता चलाप्राचीन भारत की जाती-सूत्र के दो छोर है
ये नौजवान,
सामाजिक  बंधनों से दूर, बैठे है साथ-साथ
कसमे खाते भविष्य को संवारने की, एक-दुसरे के,
एक को चिंता अच्छी नौकरी, दूसरा स्वप्ने देखता बच्चो के
पता न चला, बीत गया लम्बा वक्त
साथ-साथ, बैठे दीवार पर,
सुकून से, प्यार से,
इक शाम, मेले मे, साथ- साथ.
                  मुसाफिर क्या बेईमान 

4 comments:

संजय भास्कर said...

यथार्थमय सुन्दर पोस्ट
कविता के साथ चित्र भी बहुत सुन्दर लगाया है.

रश्मि प्रभा... said...

वो बैठे शांत चित्त, अख़बार बिछाये दीवार पर,
करती अठखेलियां उगलियाँ, सताने को, एक-दूसरे पर,
बाटें अपने- अपने जीवन की घटनाएँ
जैसे सुना रहें युद्घ के वृत्तांत, मिलकर दो फौजी सिपाही
मंद- मंद गुणगुना रहे गीत, श्रवणों में, एक-दूजे के,bahut badhiyaa

: केवल राम : said...

सच्चाई को सामने रख दिया है एक शाम के माध्यम से ..!

मुसाफिर क्या बेईमान said...

शुक्रिया संजय जी, रश्मि जी और भाई केवल राम जी.