Tuesday, August 16, 2011

तलाश-सुकून


तलाश फिर से सुकून की, 
जिन्दगी की, 
जिंदगानी की,
कुछ पल बिताये तो लगा,
महसूस हुआ,
कि
शायद ठहर गयी है तलाश,
अब न पड़ेगा भटकना,
टूट  जाता है सब,
किसी सुंदर  ख्वाब  की तरह,
और 
 फिर  से 
घेरती है ये बैचेनी,
 नोचती है जर्रा-जर्रा,
मजबूर करती है,
ढूँढने को,
निकलती है एक  नई तलाश मे
 फिर से 
 सुकून की.
 ------------- मुसाफिर  क्या  बेईमान
  
 
 


 






3 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

सुकून की तलाश .... वाह

: केवल राम : said...

शायद ठहर गयी है तलाश,
अब न पड़ेगा भटकना,
टूट जाता है सब,
किसी सुंदर ख्वाब की तरह,

जीवन भी क्या विरोधाभास है ...कहीं सकूं की तलाश तो कहीं खुद को समझने का प्रयास ....!

रश्मि प्रभा... said...

shaandaar rachna