Thursday, April 21, 2011

वफ़ा क्या ऐसे ---



समझ मे आ जाये, कमबख्त,
बदलते जज्बात इश्क मे,
वफ़ा से नजर आयगी, बेवफाई उसकी
सहते रहे जुल्मो-सितम,
इश्क के नज़ारे समझ कर,
अपने-अपने न रहे,
पराए न गैर सही
आसूं कमबख्त न रोकें, रुके,                  
मयखाने तो बहाने बने, इश्क मे,
अभी तो इश्क, की देखी झलक,
न जाने, क्या---क्या तमाम है बाकि, 
इस सफ़र के दरमयान.  


***************मुसाफिर क्या बेईमान

5 comments:

: केवल राम : said...
This comment has been removed by the author.
रश्मि प्रभा... said...

badhiyaa

Shalini said...

bahut pasand aya!!

Fitrat par Nakabon ke itne rang,
Kudrat bhi dekh reh jati hai dung,
Shayad Kudrat Bechari is kadar bekhabar hai,
Ki Insani Fitrat usse bhi kahin bulund hai..............!!!!

मुसाफिर क्या बेईमान said...

शालिनी जी, कृपया, आप मेरा कमेन्ट इस पर देखें.
http://safar-jindgika.blogspot.com/2011/04/blog-post_23.html

संजय भास्कर said...

ह्र्दय की गहराई से निकली अनुभूति रूपी सशक्त रचना